अहसास रिश्‍तों के बनने बिगड़ने का !!!!

एक चटका यहाँ भी

नमस्कार ,
दो दिन पहले शास्त्री जी का दो पोस्ट पढा था "‘‘शिक्षित बेरोजगार’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)" और‘‘अँगूठा छाप को काम, मनमाना दाम’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’).

उसके परिप्रेक्ष्य में कुछ बातें मै यहाँ रखना चाहता हु .
ये सही बात है कि हमारे देश में शिक्षित बेरोजगार की संख्या बहुतेरे है लेकिन मेरा आप सब से बस एक सवाल है आप किस तरह से शिक्षित और अशिक्षित में फर्क करते है .
क्या नाम लिखने वाला शिक्षित हो गया और नाम ना लिख पाने वाला अशिक्षीत ?
या शिक्षित का मतलब डीग्री कालेज से स्नातक होना .

हमारे देश कि जनसंख्या इतनी है जितने सर में बाल , इस तरह के माहौल में सरकारी नौकरी पाना चाँद पर पैदल जाने के सामान है , और इस तरह के माहौल में सरकारी नौकरी की आशा करना एक तरह से बहुत बड़ा साहस का काम .
अब आप पुकोगे कि
साहस का काम क्या . तो मै बता देता हु सरकारी नौकरी करने के लिए समय और पैसा दोनों को खर्चा करना पड़ता है . हमारा समाज ऐसा है कि आप को नौकरी नहीं मिल रही इसकी चिंता और लोगो को ज्यादा रहती है कहने के लिए , आपको समय कुसमय याद दिलाते रहेगे कि क्या हुआ भाई कही मामला सेट हुआ ?
आदमी झल्ला जाता है और तब उसके मन में सोच आता है कि कही हजार पंद्रह सौ की नौकरी भी मिल जाए तो बहुत है .
ये तो बात हुई सरकारी नौकरी खोजने वाले लोगो कि अब चलते है दूसरी तरफ जहां कि प्राइवेट नौकरी की बात होगी.


रमेश समाजशास्त्र से M.A किया हुआ है और गाव में लोगो की बाते सुन सुन कर तंग हो गया और नौकरी की तलाश में गुजरात आता है . कई कंपनियों में तलाश करता है . ढेर सारे नौकरी दिलाने वाले दलालों के पास भी जाता है . उसको नौकरी मिल भी जाते है लेकिन काम होता है कपडो के गट्ठर ढ़ोने
का . अब आप बताइये कहा की शिक्षा , कहा गया समाज शास्त्र का ज्ञान . दब गया .

उसको भी मजदूरी करने के लिए बेबस होना पडा हमारे समाज के कुछ गिने चुने लोगो कि वजह से .
हमारे यहाँ खाश कर उत्तर प्रदेश बिहार में शिक्षा प्रणाली ऐसी है कि कहना ही क्या.

देश के होनहार लोगो को २१ साल तक समाज शास्त्र पढा कर छोड़ दिया जाता है कहने को तो वे शिक्षित हो जाते है लेकिन तकनीकी ज्ञान शुन्य .
और दूसरी तरफ मजदूर कहने को तो निरक्षर है लेकिन उसे अच्छी तरह पता है कि कौन सा इट कहा रखना है और कौन सा कोना तेढा हो रहा है .

कहने का मतलब सिर्फ इतना है आज साक्षर और निरक्षर कि परिभाषा बदल गयी है जिसके हाथ में तकनीकी ज्ञान है वो साक्षर और जिसके हाथ में तकनीकी ज्ञान नहीं सिर्फ स्कूली शिक्षा है और और सरकारी नौकरी है तब तो वो साक्षर नहीं तो निरक्षर .

आज जरुरत है हमारे शिक्षा प्राणाली को बदलने की अगर हमें तकनीकी शिक्षा प्राप्त हो तो हम बेरोजगार नहीं रह सकते .

पंकज मिश्रा


आपका स्वागत है यहाँ भी चर्चा हिन्दी चिट्ठो में



12 comments:

  1. Babli on September 23, 2009 at 5:40 AM

    आपने सही मुद्दे को लेकर बहुत ही सुंदर रूप से प्रस्तुत किया है! बेरोज़गारी की समस्या बढती ही जा रही है! यहाँ तक की शिक्षित लोगों को भी नौकरी के लिए दर दर भटकना पड़ता है! अगर शिक्षित लोगों को काम मिलता भी है तो अशिक्षित लोगों के काम के बराबर तब पढने लिखने का क्या फायदा? हर गाव में बच्चों को शिक्षा देनी चाहिए ताकि हमारे देश में अशिक्षित लोग न रहे और उन्हें जीवन में कुछ बनने का मौका मिले!

     
  2. Arvind Mishra on September 23, 2009 at 6:41 AM

    आपका विचार विचारणीय है !

     
  3. डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक on September 23, 2009 at 6:42 AM

    बिल्कुल सही सुझाव है।
    प्रस्तुति बहुत बढ़िया है।
    बधाई!

     
  4. ताऊ रामपुरिया on September 23, 2009 at 7:36 AM

    बहुत सुंदर सोच है आपकी.सहमत हूं.

    रामराम.

     
  5. महफूज़ अली on September 23, 2009 at 1:11 PM

    bahut hi sahi mudda uthaya hai pankaj................ technical education is must.........

     
  6. Anonymous on September 23, 2009 at 2:22 PM

    its a very critical issue !

     
  7. अनुनाद सिंह on September 23, 2009 at 2:42 PM

    आपको भारी गलतफहमी है कि जिसने तकनीकी शिक्षा प्राप्त की है उसे आराम से उचित नौकरी मिल जाती है। असलियत इससे बहुत दूर है।

     
  8. Pankaj Mishra on September 23, 2009 at 3:04 PM

    @ जिसने उचित ढंग से तकनीकी शिक्षा प्राप्त की है वो एक हद तक सफल है इस समय के माहौल में . और हां जिसके हाथ में गुण है वो खाने के लिए नहीं मर सकता ये तो आपने सुना ही होगा

     
  9. ab inconvenienti on September 23, 2009 at 5:07 PM

    तो फिर देश मे आज एक भी इंजीनियरिंग पास बेरोज़गार नहीं मिलेगा? हर एक आईटीआई किए हुए आदमी को भी छोटिमोटी ही सही नौकरी मिल ही चुकी होगी? कितने ही पैरामेडिक्स, आयुर्वेदिक होमियोपैथिक और आल्टरनेटिव मेडिसिन मे डिग्रीधारी बेकार क्यों घूम रहे हैं?

     
  10. Murari Pareek on September 23, 2009 at 5:25 PM

    सही है जिसके पास हाथ का हुनर है वो ही शिक्षित है | सरकारी नोकरी कितनो को नसीब होगी ?

     
  11. Pankaj Mishra on September 23, 2009 at 5:37 PM

    @कितने ही पैरामेडिक्स, आयुर्वेदिक होमियोपैथिक और आल्टरनेटिव मेडिसिन मे डिग्रीधारी बेकार क्यों घूम रहे हैं?
    बेकार वही घूम रहे है जिन्होंने डिग्री पढाई करके नहीं बल्की किसी और तरह से ख़रीदी होगी नहीं तो कोई भी पैरामेडिक्स, आयुर्वेदिक होमियोपैथिक और आल्टरनेटिव मेडिसिन मे डिग्रीधारी अपना खुद का भी तो प्रक्टिस कर रहे होगे . कभी बेकार नहीं बैठेगे

     
  12. Manoj Bharti on September 23, 2009 at 11:23 PM

    शिक्षा पर आपके विचार जानकर प्रसन्नता हुई ।
    शिक्षा के सही मायने हैं मनुष्य के अंदर छिपी हुई संभावनाओं को बाहर निकालना । शिक्षा का उद्देश्य मात्र साक्षर होना नहीं, बल्कि स्वयं की संभावनाओं को खोजना और तदनुसार व्यवहार करना है । शिक्षा विवेक और प्रज्ञा के जागरण का दूसरा नाम है । तकनीकी शिक्षा मात्र रोजगार और नौकरी के लिए सहायक हो सकती है, लेकिन मानवीय विवेक को जागृत करने के लिए अन्य कलाओं का विकास जरूरी है ।

     

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साँस लेते हुए भी डरता हूँ! ये न समझें कि आह करता हूँ! बहर-ए-हस्ती में हूँ मिसाल-ए-हुबाब! मिट ही जाता हूँ जब उभरता हूँ! इतनी आज़ादी भी ग़नीमत है! साँस लेता हूँ बात करता हूँ! शेख़ साहब खुदा से डरते हो! मैं तो अंग्रेज़ों ही से डरता हूँ! आप क्या पूछते हैं मेरा मिज़ाज! शुक्र अल्लाह का है मरता हूँ! ये बड़ा ऐब मुझ में है 'yaro'! दिल में जो आए कह गुज़रता हूँ!
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