अहसास रिश्‍तों के बनने बिगड़ने का !!!!

एक चटका यहाँ भी

~~नमस्कार~~
कल हिन्दी दिवस के अवसर पर बहुत से ब्लॉग पर हिन्दी दिवस के बारे में पढा और ढेर सारे कमेन्ट भी देखे इससे संबधीत . मै भी एक हिन्दी भाषी राज्य से हु और अच्छी तरह हिन्दी बोल समझ लेता हूँ . लेकिन क्या अच्छी तरह हिन्दी बोल समझ लेना ही काफी है ? नहीं ना !
ठीक इसी तरह सिर्फ हिन्दी समझ लेना भी काफी नहीं है . कल एक कमेन्ट पढ़ा था " मुझको हिन्दी मगता है आज!!

लेकिन मै तो ये कह रहा हु मुझको रोटी मगता है पेट भरने के लिए हिन्दी से आप सबसे बड़ी पढाई कर लीजिये लेकिन सिर्फ - जगहों को छोड़कर कही गुजारा नहीं होने वाला है .और वो जगह है सरकारी नौकरी , खुद का बिजनेश . और दोनों सिर्फ गिने चुने राज्यों में ही हो सकती है !

ऐसे में हिन्दी के दुहाई देना कहा की बुद्धिमानी है जहा पर कि हिन्दी बोलने वालो को ही पीटा जाये :)
एक बार की बात है कि एक नेता हिन्दी दिवस पर विशेष कार्यक्रम में बुलाये गए थे . वहा पर सारा समाज इकट्ठा था . एक बेरोजगार नौजवान भी भाषण सुनाने गया था . भाषण समाप्त होने के बाद नौजवान ने नेताजी से नौकरी की दुहाई दी . नेताजे ने उसे अपने साथ अपनी कार में बिठा लिया और बोले कि कहा तक पढाई किया है . लड़का बोला जी स्नातकोत्तर किया हु . नेता जी ने पूछा कि किस विषय से ?
लडके ने उत्तर दिया कि , समाज शास्त्र और हिन्दी .
लडके ने उत्तर दिया और नेता ने उसे कार से उतार दिया , जानते है क्या कहकर ?

ये कहकर कि मै तो सोचा था कि तुम्हे थोडा बहुत अंगरेजी आती होगी तो तुम्हे अपने पांच सितारा होटल में मनेजर रख लूगा लेकिन अगर नहीं आती तो चपरासी भी नहीं रख सकता .
अब आप बताओ ये कैसा हिन्दी प्रेम .

अरे हिन्दी दिवस पर कुछ ऐसा करिए कि हिन्दी भाषी लोगो को नौकरी मिले , इज्जत मिले.


17 comments:

  1. हेमन्त कुमार on September 15, 2009 at 5:44 AM

    क्या खूब कही । आभार ।

     
  2. संगीता पुरी on September 15, 2009 at 5:56 AM

    सहमत हूं आपसे .. चूंकि आज हम असमर्थ हैं .. किसी का सहारा लेने से परहेज क्‍यूं .. पर जो समर्थ हैं .. वे तो हिन्‍दी को मजबूत बननाने की दिशा में काम कर सकते हैं .. ब्‍लाग जगत में कल से ही हिन्‍दी के प्रति सबो की जागरूकता को देखकर अच्‍छा लग रहा है .. हिन्‍दी दिवस की बधाई और शुभकामनाएं !!

     
  3. Udan Tashtari on September 15, 2009 at 6:53 AM

    सही कह रहे हैं..मगर अपना कार्य जारी रखिये.

    हिंदी दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ.

    कृप्या अपने किसी मित्र या परिवार के सदस्य का एक नया हिन्दी चिट्ठा शुरू करवा कर इस दिवस विशेष पर हिन्दी के प्रचार एवं प्रसार का संकल्प लिजिये.

    जय हिन्दी!

     
  4. रविकांत पाण्डेय on September 15, 2009 at 7:02 AM

    पंकज जी,
    आपकी बात विचारणीय है और हिंदी के खोये मान-सम्मान को वापस लाने के लिये तथा उसे लोकप्रिय बनाने के लिये ये जरूरी है कि हिंदी में रोजगार की संभावनाएं भी बढ़ाई जाए।

     
  5. संजय तिवारी ’संजू’ on September 15, 2009 at 7:15 AM

    आपका हिन्दी में लिखने का प्रयास आने वाली पीढ़ी के लिए अनुकरणीय उदाहरण है. आपके इस प्रयास के लिए आप साधुवाद के हकदार हैं.

    आपको हिंदी दिवस की हार्दिक शुभकामनायें.

     
  6. ताऊ रामपुरिया on September 15, 2009 at 9:44 AM

    आपकी बात मे दम है.

    रामराम.

     
  7. पी.सी.गोदियाल on September 15, 2009 at 9:48 AM

    पंकज जी हिन्दी अपनी जगह है और हर उस इंसान को जिसे हिन्दी से लगाव है उसे अपने जुबा रूपी मंदिर में मुख्य जगह पर प्रतिस्थापित करना चाहिए लेकिन इसका मतलब यह नहीं की आप इस हिन्दी रूपी अपने भगवान् के साथ और कोई किसी भाषा की मूर्ती ना रखे ! मात्रभाषा को उचित दर्जा देने के साथ साथ उन भाषाओं को भी सीखना चाहिए जिनसे खाना कामना है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं की अगर आप हिन्दी को प्रमुखता देंगे तो न खा कमा पाने का दोष भी उसी को देंगे ! यह जानते हुए भी कि अंगरेजी पढ़कर ही बच्चे ने आगे जाकर खाना कमाना है उत्तरभारत के स्कूलों में प्राइमरी में उसे जान्भूकर न पढाना सिर्फ नेतावो की चाल का हिस्सा है ! ये हरामखोर नहीं चाहते कि देश के अन्य बच्चे भी कम्ब्रिज में पढने वाली उसके बेटे की बराबरी कर सके !

     
  8. जी.के. अवधिया on September 15, 2009 at 10:11 AM

    पंकज जी, जब तक हमारे भीतर हिन्दी के प्रति सम्मान की हार्दिक भावना जागृत नहीं होगी, हिन्दी को उसका उचित स्थान नहीं मिलने वाला। और हमारे देश की शिक्षानीति इस भावना को जागने नहीं देगी।

     
  9. Pankaj Mishra on September 15, 2009 at 10:15 AM

    @ और उसी चाल का नतीजा यह होता है कि बच्चे नौजवान तो हो जाते है लेकिन मानसिक विकाश कितना है तब पता चलता है जब कही साक्षात्कार देने जाते है.
    घुट-घुट कर अपने सपनों को मरते देखते है इन नेताओं की वजह से .
    हमारा बस यही कहना है कि मात्रभाषा तो हम अपने घरो में सीख लेते है लेकिन जो लोग इसी मात्रभाषा का लाभ उठाकर हमें बर्बाद करते है इस हिन्दी दिवस पर उनको सबक सीखाने का बीडा उठाये !

    धन्यवाद

     
  10. Nirmla Kapila on September 15, 2009 at 10:31 AM

    पंकज जी धीरज रखिये जब आप जैसे युवा अपने हाथ मे कमान ले लेंगे तभी इन नेताओं को सबक सिखाया जा सकता है जल्दी ही वो समय आयेगा शुभकामनायें

     
  11. दिगम्बर नासवा on September 15, 2009 at 1:32 PM

    सही कह रहे हैं .... पर सब को इस बात के लिए प्रयास करना पढेगा ........आप भी करें हम भी करें ...........

     
  12. अनिल कान्त : on September 15, 2009 at 2:10 PM

    बात मे दम है.

     
  13. ओम आर्य on September 15, 2009 at 4:30 PM

    बहुत ही सुन्दर बात कही है आपने ......अतिसुन्दर

     
  14. महफूज़ अली on September 15, 2009 at 7:23 PM

    अरे हिन्दी दिवस पर कुछ ऐसा करिए कि हिन्दी भाषी लोगो को नौकरी मिले , इज्जत मिले.

    bilkul sahi kaha.......

     
  15. cmpershad on September 15, 2009 at 11:21 PM

    हम एक विदेशी भाषा इसीलिए तो सीखते हैं कि उससे हमें रोज़ी-रोटी मिलेगी। जिस दिन राष्ट्रभाषा रोज़ी-रोटी की भाषा हो जाएगी, अंग्रेज़ी घास चरने जाएगी..निश्चित है... पर हमारे अंग्रेज़ी बाबूलोग अपनी कुर्सी ऐसे ही थोडे ही छोडे़गे! धक्का तो देना होगा:)

     
  16. शरद कोकास on September 16, 2009 at 4:26 PM

    नीन्द मे भी आप सच बोलते हैं?

     
  17. Leonardo hoyos on September 16, 2009 at 9:32 PM

    ja !

     

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साँस लेते हुए भी डरता हूँ! ये न समझें कि आह करता हूँ! बहर-ए-हस्ती में हूँ मिसाल-ए-हुबाब! मिट ही जाता हूँ जब उभरता हूँ! इतनी आज़ादी भी ग़नीमत है! साँस लेता हूँ बात करता हूँ! शेख़ साहब खुदा से डरते हो! मैं तो अंग्रेज़ों ही से डरता हूँ! आप क्या पूछते हैं मेरा मिज़ाज! शुक्र अल्लाह का है मरता हूँ! ये बड़ा ऐब मुझ में है 'yaro'! दिल में जो आए कह गुज़रता हूँ!
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