अहसास रिश्‍तों के बनने बिगड़ने का !!!!

एक चटका यहाँ भी

आज सुबह मै जब घर से निकला तो देखा हवा थोडा तेज चल रहा है और पेडो की टहनिया आपस में रगड़ खा रही है . कुछ देर तो मै बस देखता ही रह गया अन्दर
से आवाज आयी कि पंकज ऐसे क्या देख रहे हो ये तो रोज ही ऐसे कलरव करते है लेकिन आप जैसे लोगो को समय नहीं रहता इन्हें देखने का , इन्हें महसूस करने का .


सच ही तो कहा था मेरे दिल ने , याद गया बचपन , याद गया अपना गाव और गाव के लोग और गाव की बातें .
गर्मी में प्रचंड गर्मी घर के बड़े बुजुर्ग तो दोपहर में सोना पसंद करते है लेकिन बच्चो का क्या और नौजवानों का क्या ?
उनको कैसे नीद आये और वो भी मई जून महीने की गर्मी में . सुबह १० बजे ही लगता था कि गर्मी बरदास्त नहीं होगी बाग़ में जाकर आम के टिकोरो को नमक के साथ खाना और बाद में किसी के घर से गुड लेकर कुए का पानी पीना ,


रेडियो पर क्रिकेट सुनना और दोपहर १२:३० पर आकाशवाणी का वो गाना इतना आराम देता था जितना कि आज २४ घंटे का FM चैनल नहीं दे पाता. दोपहर के एक बजते बजते बरफ वाले की भोपू और हम लोग घर के दाने को देकर बरफ ले लेते क्युकी उस समय गेहू की फसल हुई रहती थी और घर सेलेना भी आसान

आधा किलो गेहू दे दते थे और बदले में ५० पैसे की बरफ अच्छा बेवकूफ बनाता था बरफ वाला ...

बाकी कल के अगले हिस्से में


कौन बदला है हम या प्रकृति ?
आज भी हवा उसी तरह बहती है , लेकिन हम तो पहले से अलग अब कार से चलते है .
आज भी बारीश उसी तरह गिरती है , लेकिन हम अब उसे रोकने के लिए इंतजाम करते है .
आज भी गर्मी ठंढी वैसे ही पड़ती है , लेकिन हम आज हीटर और कूलर रखते है .


आज भी वो हमें शुद्ध आहार ही देती है , लेकिन हम स्वाद के लिए उसे एक्स्ट्रा तैयार करते है.
आज भी वो हमें खुला आसमान देती है , लेकिन अब तो हम टॉयलेट भी अंगरेजी पसंद करते है.


क्रमश:




6 comments:

  1. Udan Tashtari on September 18, 2009 at 5:17 AM

    हम हीं बदल गये हैं..

     
  2. Nirmla Kapila on September 18, 2009 at 9:50 AM

    बिलकुल सही है हम बदल गये हैं शुभकामनायें

     
  3. विनोद कुमार पांडेय on September 18, 2009 at 10:55 AM

    बचपन तो वहीं है वही सब कुछ है बस समय की भागदौड़ में हमने खुद से समझौता कर लिया और खुद को ही बदल डाला..

     
  4. कुलवंत हैप्पी on September 18, 2009 at 3:06 PM

    कुछ नहीं बदला सिर्फ हम बदल गए। बारिश को रोकने के लिए रेनकोर्ट, धूप से बचने के लिए छत्ता, ऐसी, कूलर, वगैरह} अद्भुत लिखा है।

     
  5. ताऊ रामपुरिया on September 18, 2009 at 5:12 PM

    बिल्कुल सही है, पूरे बदल गये जी.

    रामराम.

     
  6. डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक on September 18, 2009 at 9:32 PM

    जब हम बदल गये तो प्रकृति को भी
    बदलना ही पड़ा!

     

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साँस लेते हुए भी डरता हूँ! ये न समझें कि आह करता हूँ! बहर-ए-हस्ती में हूँ मिसाल-ए-हुबाब! मिट ही जाता हूँ जब उभरता हूँ! इतनी आज़ादी भी ग़नीमत है! साँस लेता हूँ बात करता हूँ! शेख़ साहब खुदा से डरते हो! मैं तो अंग्रेज़ों ही से डरता हूँ! आप क्या पूछते हैं मेरा मिज़ाज! शुक्र अल्लाह का है मरता हूँ! ये बड़ा ऐब मुझ में है 'yaro'! दिल में जो आए कह गुज़रता हूँ!
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