अहसास रिश्‍तों के बनने बिगड़ने का !!!!

एक चटका यहाँ भी

नमस्कार ,
कल से बहुत डर लग रहा है ताऊ जी ने बताया है कि हवा खराब चल रही है ,
कुछ दिन पहले चिकन गुनिया . स्वाइन फ्लू , और वायरल झेला हूँ , अब शायद मौजुलिया झेलने की बारी है . मौजुलिया उस रोग का नाम है जिसमे कोई ब्लॉगर दुसरे ब्लॉगर की मौज ले :)
इसके चलते लोग अपने प्रमुख उद्देस्य को परे कर देते है पूरा रमजान पार होने को है , नवरात्री आने को हैलेकिन इस मौजुलिया रोग ने ऐसा पैठ मारा है कि इन सब पर कोई लिखेगा ही नहीं सब तो मौज लेने में लगे है एक दुसरे की .
सब मतलब सब नहीं :)


भगवान आप सब को और हमको भी इस रोग से निजात दिलाये .




http://www.uselessgraphics.com/Rat33.gif


एक आदमी कार से जा रहा था ताज ,
सामने से चूहा लौटा था देखकर ताज ,
जोरदार टक्कर चूहा और कार में ,
चूहा बेहोश चारो खाने चित्त ,
आदमी उतरा कार से और चूहे को उठाया ,
चूहे को लेकर घर तक आया डाक्टर बुलवाया, दवा दिलवाया .


डाक्टर बोला इसको पिजरे में रखो जब तक ना आये होश ,
चूहा तक तक पडा था बेहोश .
कुछ देर बाद चूहा आया होश में , देखा अपने आप को पिजरे में तो बोला जोश में .
आईला क्या मेरे टक्कर से आदमी मर गया क्या ?
मुझे जीवन भर उम्र कैद कर गया क्या ?



9 comments:

  1. Arvind Mishra on September 17, 2009 at 5:18 AM

    वाह पंकज जी आप ने भी मौज ले ही ली !

     
  2. हिमांशु । Himanshu on September 17, 2009 at 6:13 AM

    सोचने का अधिकार सबको है । चूहे के अवचेतन में बसी इच्छा है यह तो । मौका तो मिलने दीजिये ।

    जबर्दस्त । आभार ।

     
  3. Udan Tashtari on September 17, 2009 at 6:28 AM

    मौजुलिया और ताऊ से...ये कौन कर सकता है भई..हमें बताओ जरा, देखे उसको.

     
  4. डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक on September 17, 2009 at 7:43 AM

    वाह...।
    आदमी तो जीवित है, मगर इन्सान मर गया है।

     
  5. ताऊ रामपुरिया on September 17, 2009 at 10:53 AM

    भाई सोच रहा हू मौज लेने पर केटेगरीवाईज टेक्स लगादूं.:)धंधा अच्छा चलेगा.

    रामराम.

     
  6. प्रसन्न वदन चतुर्वेदी on September 17, 2009 at 1:11 PM

    बेहतरीन प्रस्तुति....बहुत बहुत बधाई...
    मैनें अपने सभी ब्लागों जैसे ‘मेरी ग़ज़ल’,‘मेरे गीत’ और ‘रोमांटिक रचनाएं’ को एक ही ब्लाग "मेरी ग़ज़लें,मेरे गीत/प्रसन्नवदन चतुर्वेदी"में पिरो दिया है।
    आप का स्वागत है...

     
  7. Babli on September 17, 2009 at 1:33 PM

    वाह वाह क्या बात है पंकज जी! मज़ा आ गया! शानदार और ज़बरदस्त पोस्ट!

     
  8. दिगम्बर नासवा on September 17, 2009 at 4:58 PM

    VAAH MAJAA AA GAYA PANKAJ JI ....... UMR BHAR KI KAID DILWA DI CHOOHE KO ...

     
  9. ओम आर्य on September 17, 2009 at 5:00 PM

    मै हिमांशू जी के विचार से सहमत हूँ......और सच कहू तो मज़ा आ गया........सच मे कमाल करते हो आप....

     

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साँस लेते हुए भी डरता हूँ! ये न समझें कि आह करता हूँ! बहर-ए-हस्ती में हूँ मिसाल-ए-हुबाब! मिट ही जाता हूँ जब उभरता हूँ! इतनी आज़ादी भी ग़नीमत है! साँस लेता हूँ बात करता हूँ! शेख़ साहब खुदा से डरते हो! मैं तो अंग्रेज़ों ही से डरता हूँ! आप क्या पूछते हैं मेरा मिज़ाज! शुक्र अल्लाह का है मरता हूँ! ये बड़ा ऐब मुझ में है 'yaro'! दिल में जो आए कह गुज़रता हूँ!
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