अहसास रिश्‍तों के बनने बिगड़ने का !!!!

एक चटका यहाँ भी

शंकर चाय वाला

by Mishra Pankaj | 1:58 PM in |

हमारा काम बनता,भाड़ में जाए जनता
ये किसी के मुह से कहते कम सुनता हु पर करते सभी लोग है।
कुछ तो चोरी छिपे करते है कुछ सरे-आम करते है , कुछ तो पुलिसिया तर्ज पर करते है तो कुछ नेताओ की तरह "मुह में राम बगल में छुरी" रखकर करते है ।
क्या करते है आप खुद पढ़ लो ।
नेताओ की नेतागिरी देखनी हो तो सुबह किसी चाय की दुकानं पे चले जाइये ।
मेरे हिसाब से चाय की दुकान ही एक ऐसी जगह है जहा नेतागिरी वाला जिवाडू जल्दी सक्रीय होते है ।
असेम्बली देलही सुबह देर से लगेगी तब तक तो यहाँ चाय की दूकान पे सारे समाचार पत्र का सारांश बाच लिया गया होगा और किसी न किसी के हवाले से दो -चार ठो वक्तब्य भी पास कर दिया गया होगा ।

चलो यहाँ तक तो बात समझ में आती है की अगर एक ही पार्टी के सारे लोग है तो फीर गम नही है अगर सोनिया को कुछ बोले तो सभी हाँ में हाँ लेकिन ?
अगर दो पार्टी सुबह - सुबह चाय की दूकान पे आमने सामने हो गयी तब?
चलो फिर भी बात बन सकती है हो सकता है की दोनों लोग कोई कमेन्ट कराने के मूड में ना हो लेकिन?
चाय बेचने वाले जो गाँव में होते है उनमे ये जीवाणु कुछ हद तक पहले से हे मौजूद होते है
क्युकी आप तो चाय पीने के लिए जाओगे तो मुस्किल से १० मिनट रहोगे और अगर नेता टाइप के हो तो बकबका के चले आओगे और अगर किसी और के फोलोवर हो तो उसकी चाय पी के जय -जय कार करके चले आओगे लेकिन ओ अकेला ऐसा चाय वाला ही बचता है जो हम जैसे कई नेताओ का भाषण दिन भर में सुनता है ।
अब अगर आप दोनों पार्टी के लोग चुप चाप चाय पी के निकलना भी चाहोगे न तो ऐसा होने नही देगा ।
आप को ट्रिप करेगा और दुसरे को ड्रेन अगर आप ट्रिप नही होते हो तो आप तो स्वतः ड्रेन हो गए उसका काम आसन हो गया और ओ दुगुनी मेहनत लगाकर दुसरे को कर देगा फिर मस्ती में तमाशा देखेगा .

और ओ दोनों विपक्षी पार्टी के बंधू लोग जमकर बहस करेगे कितनी बार नौबत ये आ जाती है कि शाम तक उसमे से एक के नाम वारंट भी कट जाता है ।
और ओ शंकर चाय वाला मस्ती से पुरे दिन बैठकर दोनों लोगो के बारे में बाकी लोगो को बताएगा ।

भइया " थोड़ा एक पण में मसला ज्यादा डाल देना दुबेजी के लिए ।
शंकर चाय वाला - अरे मसाला वाला खा लो चाहो चुना वाला लेकिन एक मसालेदार बात फ्री में सुन लो ।
तुम्हहू और दुबे दुन्हू

क्या?
शंकर चाय वाला - आज हाथी पंजा फिर से भीडे।
अरे उनका तो रोज का है ।
शंकर चाय वाला - नही-नही आप समझे नही रोज और आज में अन्तर था ।
क्या?
चाय वाला - यही की , आज शाम तक अन्दर ।
कौन ?
मुझे तो लगता है पंजा वाला ( डॉक्टर साहब ) बीस पडेगा ।
कैसे?
अरे केन्द्र सरकार है ।
तो क्या हुआ ?
शंकर चाय वाला - तो क्या हुआ सोनिया तक पहुच है ।
हा पर फायनली सरकार यहाँ तो हाथी ही है .
बीस तो अपने चौधरी ही पड़ेगे

अब वह शख्श तो पान लेकर गया शंकर बाबू ने किसी तरह अपना टाइम पास किया दिन भर अब शाम को देखिये क्या होता है ?
अब शाम को फिर पंजा के लोग इकट्ठा होते है .
अब शंकर फिर ट्रिप करता है .
आये थे बड़े हाथी धारक मै हम तो साफ -साफ बोल दिए की कुछ भी कहो मै सुन सकता हु पर अपने नेताजी की बुराई कतई नहीं हा !!!
अब तो डॉक्टर साहब फूल के कुप्पा ---------------बोले कौन कह रहा था
अरे वही मरेला झगडू प्रसाद .
अच्छा ठीक है इससे निपटने के बाद उसको भी देख लूगा .
उनके जाने के तुंरत बाद चौधरी जी आते है . तब
आव -आव चौधरी साहेब बहुत भग्यान हो आप .
चौधरी - काहे का हुआ ?
शंकर चाय वाला- चौधरी साहेब सुने थे कि बच्चे तक साथ छोड़ देते है लेकिन आप के लिए तो आधा गाँव एक हुआ है .
चौधरी - और आधा .
शंकर चाय वाला- पूछिये मत . जो चोर बन्दोल है ओ नहीं न समझेगे .
इस तरह से एक चाय वाला आधे गाँव को बेवकूफ और आधे को सचेत साबित करता है .
मै तो ऐसा व्वाहरीक तौर पर देखा था .
अगर आपको भी कुछ ऐसा लगता है गाँव के चाय विक्रेता के बारे में तो यहाँ लिखिए .

1 comments:

  1. राज यादव on July 19, 2009 at 8:12 PM

    pankaj ji...jaunpur me kahan se hai

     

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साँस लेते हुए भी डरता हूँ! ये न समझें कि आह करता हूँ! बहर-ए-हस्ती में हूँ मिसाल-ए-हुबाब! मिट ही जाता हूँ जब उभरता हूँ! इतनी आज़ादी भी ग़नीमत है! साँस लेता हूँ बात करता हूँ! शेख़ साहब खुदा से डरते हो! मैं तो अंग्रेज़ों ही से डरता हूँ! आप क्या पूछते हैं मेरा मिज़ाज! शुक्र अल्लाह का है मरता हूँ! ये बड़ा ऐब मुझ में है 'yaro'! दिल में जो आए कह गुज़रता हूँ!
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