अहसास रिश्‍तों के बनने बिगड़ने का !!!!

एक चटका यहाँ भी

नमस्कार ,


दीपावली बीत गयी, आज नया साल भी हो गया सब कुछ नया रहा नया कपडा , नया रंगरोगन, नए नए शुभकामना सन्देश सब कुछ नया लेकिन कुछ ऐसे पहलू है  कि बदल  नहीं रहा है वो है हमारे भारत की बेचारी बेरोजगारी ,भुखमरी और बीमारी ....
कल दीपावली को हर घर में पूजा हुआ , पटाखे छुडाए गए और मिठाइया बाटी गयी ऐसा आप कह सकते है , क्युकी आपने अपने आस-पास में यही सब देखा है ... काश आप ऐसे भी घर देखते जहा आज भी लोग भूखे सो गए , मरीज पटाखे की आवाज से  परेसान था और बेरोजगार आज भी नौकारी की लालसा में दुखी सो गया......
आज हर घर में दीपावली के दीप जलाए गए और पटाखे और फ़ुल्झडिया छोडे  गए लेकिन मेरे घर पर ऐसे लगभग २० लडके आये  जो की देखने से निहायत ही गरीब और भूखे लग रहे थे ....


खुद तो भूखे थे  लेकिन  दूसरो को पैसे के लालच में दीपावली की शुभकामनाये दे रहे थे ......
सुबह कई लडके हाथ में झोला लेकर  रात के फटे पटाखे में में से सही पटाखे छाट रहे थी .. ऐसे समय में बस यही याद आ रहा था कि जिस तरह हमारे घर की महिलाए दरिद्र खेदने के नाम पर टोटके करती है

काश ऐसा ही कोई टोटका हमारे देश के प्रधानमंत्री श्री मनमोहन सिंह भी करते भारत की दरिद्रता दूर करने के लिए ......

नीचे के चित्र देखिये और बताइये कैसे रही दीपावली ...?
मै तो कहता हु काहे की दीपावली , काहे का नया साल ?
आधा भारत तो भूखा ही  सो गया

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18 comments:

  1. दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi on October 18, 2009 at 9:21 PM

    इसे सुनते सुनते भी कान फूल गए। यह भूख इतनी मजबूर क्यों है?

    आप ब्लाग शीर्षक का रंग सफेद या आसमानी रखें दिखाई नहीं दे रहा है।

     
  2. काजल कुमार Kajal Kumar on October 18, 2009 at 10:36 PM

    यही नियम है...अभी तो..

     
  3. राज भाटिय़ा on October 18, 2009 at 10:58 PM

    काश ऐसा ही कोई टोटका हमारे देश के प्रधानमंत्री श्री मनमोहन सिंह भी करते भारत की दरिद्रता दूर करने के लिए ......
    अजी कर तो रहे है, लेकिन पहले अपने ओर अपने साथियो के घर की की दरिद्रता दूर करेगे... फ़िर नगर सेठो की, फ़िर गुंडो की, फ़िर .... ओर जब तक इन गरीबो का ना० आयेगा तब तक तो ५ पेसा भी नई बचेगा???

     
  4. Anil Pusadkar on October 18, 2009 at 11:32 PM

    सही कह रहे हैं,कंही दीवाली है कंही दीवाला,कंही छप्प्न भोग है तो कंही नसीब नही है एक निवाला,ऊपर वाले का है खेल निराला।आपको दीवाली की शुभकामनाएँ।

     
  5. संगीता पुरी on October 18, 2009 at 11:34 PM

    आंखे नम कर देनेवाली पोस्‍ट .. सबमें इतनी संवेदना हो तो देश का कायापलट हो सकता है !!

     
  6. चंदन कुमार झा on October 19, 2009 at 1:13 AM

    The time is coming soon be prepared.

     
  7. Udan Tashtari on October 19, 2009 at 5:05 AM

    जिस तरह हमारे घर की महिलाए दरिद्र खेदने के नाम पर टोटके करती है

    काश ऐसा ही कोई टोटका हमारे देश के प्रधानमंत्री श्री मनमोहन सिंह भी करते भारत की दरिद्रता दूर करने के लिए ......


    --काश!! ऐसा टोटका होता कोई..

     
  8. शरद कोकास on October 19, 2009 at 5:09 AM

    आधा भारत रोज ही भूखा सोता है ..।

     
  9. डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक on October 19, 2009 at 7:43 AM

    दीपावली बीत गयी, आज नया साल भी हो गया सब कुछ नया रहा नया कपडा , नया रंगरोगन, नए नए शुभकामना सन्देश सब कुछ नया लेकिन कुछ ऐसे पहलू है कि बदल नहीं रहा है वो है हमारे भारत की बेचारी बेरोजगारी ,भुखमरी और बीमारी ....

    मिश्रा जी!
    आपने बिल्कुल सटीक पोस्ट लगाई है।

    जिन्दगी है तो उलझन-झमेले भी हैं।
    वेदनाएँ भी हैं सुख के मेले भी हैं।।
    हमको जीवन मिला तो वतन भी मिला,
    एक तन भी मिला एक मन भी मिला,
    शुद्ध भी है बहुत और मैले भी हैं।
    वेदनाएँ भी हैं सुख के मेले भी हैं।।

     
  10. Nirmla Kapila on October 19, 2009 at 9:18 AM

    ांअज भाई दूज की बहुत बहुत बधाई । दो तीन दिन से ब्लोग पर आ नहीं सकी क्षमा चाहती हूँ

     
  11. पी.सी.गोदियाल on October 19, 2009 at 9:19 AM

    इसी का नाम दुनिया है मिश्रा जी,

    किसी का मन दर्पण खाली,
    तो किसी का पेट खाली है ,
    जिसके पास है,
    बस उसी की दिवाली है !

     
  12. डॉ टी एस दराल on October 19, 2009 at 10:47 AM

    भैया, दिवाली तो सभी मनाते है. फर्क इतना है की अमीर पैसा फूंकते हैं और गरीब दूर से देखते हैं.
    ज़रा सोचिये कितने करोड़ के पटाखे और बम जला दिए गए. इससे कितने भूखों को रोटी मिल सकती थी.
    विचारणीय है.

     
  13. श्रीश पाठक 'प्रखर' on October 19, 2009 at 2:18 PM

    इसका हल फौरी तौर पर यही हो सकता है कि हम अपने आस-पड़ोस को भूखा ना सोने दें....

     
  14. ताऊ रामपुरिया on October 19, 2009 at 7:37 PM

    बिल्कूल सटीक सवाल है. और हैरत की बात है कि इसी देश मे इस साल ३० प्रतिशत बिक्री गिरने के बाद भी ३० अरब के फ़टाके फ़ूंके गये.

    यह एक दूसरा पहलू है जो आज सिर्फ़ आपकी पोस्ट मे दिखाई दिया.

    रामराम.

     
  15. alka sarwat on October 19, 2009 at 9:26 PM

    ..
    मगर दीप की दीप्ति से सिर्फ जग में ,नहीं मिट सका है धरा का अँधेरा
    उतर क्यों न आयें नखत सब गगन के,नहीं कर सकेंगे ह्रदय में उजेरा
    कटेगी तभी ये अंधेरी घिरी जब ,स्वयं धर मनुज दीप का रूप आये
    दीवाली मुबारक
    सही कहा आपने
    अच्छा प्रश्न

     
  16. लता 'हया' on October 21, 2009 at 12:54 AM

    dhanyabad
    aapki post insaniyat ke jazbe se labrez hai.

     
  17. Jogi on October 21, 2009 at 4:17 AM

    kaafi achha likha hai aapne...bilkul sahi likha apne desh k baare me ....pradhanmantri ji ke saath saath kya humara koi dayitav nahi hai kya ??? hum kya kar skate hain ??? yeh bhi sochein kya hum sabhi ....I think we all should also come forward to make a difference.

     
  18. Rakesh Singh - राकेश सिंह on October 21, 2009 at 9:52 AM

    सेंसेक्स की तेजी को ही भारत का विकास सूचक मानाने वाले अपने अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री जी को इन गरोबों को देखकर कभी नींद ना आने की शिकायत नहीं रही |

    उन्हें तो NRI के पीडा ही सताती रही है |

    इन भूखों की सुध लेनेवाला कोई नहीं ....

     

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श्री गुरुवे नमः

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साँस लेते हुए भी डरता हूँ! ये न समझें कि आह करता हूँ! बहर-ए-हस्ती में हूँ मिसाल-ए-हुबाब! मिट ही जाता हूँ जब उभरता हूँ! इतनी आज़ादी भी ग़नीमत है! साँस लेता हूँ बात करता हूँ! शेख़ साहब खुदा से डरते हो! मैं तो अंग्रेज़ों ही से डरता हूँ! आप क्या पूछते हैं मेरा मिज़ाज! शुक्र अल्लाह का है मरता हूँ! ये बड़ा ऐब मुझ में है 'yaro'! दिल में जो आए कह गुज़रता हूँ!
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