अहसास रिश्‍तों के बनने बिगड़ने का !!!!

एक चटका यहाँ भी

नमस्कार ...पंकज मिश्रा आपके साथ ...काफी दिनों से कूछ लिख नहीं पाया इस ब्लाग पर ..आज कोशीश कर रहा हु देखिये..

हुआ युं कि मै   छुट्टी में घर गया था और वहा पर छुटी का मौज लिया अब यहाँ आकर काम का बोझ ..बाप रे बाप! चलिए आपको बोदूराम के कारनामो से परिचय करवाते है ..

हमारे गाव में एक साहूकार है,  नाम है सोहन सेठ ..हुआ यु कि सोहन सेठ के पिताजी की मृत्यु हुए एक साल हो गया था ..मृत्यु के समय में भी होने वाले भोज में सोहन सेठ ने अपने कंजूसी का भरपूर परिचय  दिया था .....खाना खिलाने में कटौती कर  दी थी. और दान दक्षिणा में तो बिलकुल रूचि नहीं दिखाई थी..

साल भर बीतने के बाद गाव वालो ने कहा कि सेठ अपने पिताजी को गया पहुचा आओ ...गया बिहार में पड़ता है और हमारे यहाँ कि ऐसी मान्यता है कि अगर मृतक के सम्बन्ध का कोई गया जाकर मृतक के नाम का पिंड दान करे तो मृतक की आत्मा को शांति मिलती है ..खैर सोहन सेठ ने भी गया जाने का निर्णय ले ही लिया .
सोहन सेठ गया में पहुच भी गए ..जो भी पंडित सोहन सेठ के पास क्रिया कर्म करवाने आता ...सोहन सेठ पहले दाम पूछते ..दाम के मोल भाव में बात नहीं बनी... शाम होने को आ गयी तभी सामने से बोदूराम पंडित आते दिखाए दिए ...

2155430522_ef40f287d4 बोदूराम ने आते ही अपना परिचय दिया -नमस्कार जजमान ..मै यहाँ का पंडित ..क्रिया कर्म विशेषज्ञ ...सरकारी मान्यता प्राप्त हु.  मेरे द्वारा किर्या  करम करवाने से अच्छे अच्छे पापी आज स्वर्ग में बैठे नर्तकी नृत्य का रसपान कर रहे है ..इन्द्र के समक्ष बैठकर वहां के राज काज  में योगदान कर रहे है .मै इस तरह से कर्म कराता हु कि भगवान के पास उसका कोई काट नहीं होता सिवाय मृतक आत्मा को स्वर्ग देने के !!!
सोहन सेठ ने जब ये बातें सुनी तो उन्हें लगा कि अगर यह पंडित इतना बड़ा ज्ञाता है तो इसका रेट (दाम) भी ज्यादा होगा अतः इससे बात ना करू ...सोहन सेठ बोले कि महाराज मुझे कोई कर्म नहीं करवाना है ..
बोदूराम पंडित ताड़ गया कि सेठ तो रुपिया के लालच में मना कर  रहा है अतः बोले - जजमान आपने मेरी पूरी बात तो सुनी नहीं ...और मैं ये सब क्रिया कर्म  करवाने की दक्षिणा सिर्फ ११ रुपये ही लेता हूं .!!

अब तो सोहन सेठ को मुंह मागी मुराद मिल गयी ...और  तुरंत तैयार हो गए...क्रिया कर्म संपन्न हुआ तो सोहन सेठ ने बोदूराम को ११ रुपये देकर चरण  स्पर्श कर चलना चाहा ...तो बोदूराम ने कहा - जजमान एक बात और है मेरे कर्म कराने के बाद कर्म करवाने वाला व्यक्ति शरीर  पर जो कुछ भी धारण किया है उसे देना पड़ता है नहीं तो आगे शनिचर को उसका मौत हो जाता है...सोहन सेठ को तो करंट लग गया करे तो क्या करे?

अंततः सेठ के द्वारा शरीर पर पहने हुये सोने की चन , हीरे की अंगूठी, कडा और और सारे कपडे, यहां तक की  अंडरवीयर भी उतरवा लिया ..कुल मिलाकर  लगभग १ लाख तक का सामन  ऐंठ लिया और  सेठ से बोले -
बोलो बेटा पंडित बोदूराम की जय!
सेठ  बेडे दबे मन से  कहा - पंडित बोदूराम की जय!!!



हमारे गृह जनपद जौनपुर में एक ऐसा मंदिर है जहा के पूरे बारह गावों के लोग कभी भी सांप के काटने से नही डरते है क्युकि उनके ऊपर साप के बिष का असर नही होता है

और इस मंदिर का प्रसाद बारह गावों की पुत्रियों और भान्जीयों को खाना मना है
ऐसी धारणा है की अगर किसी कन्या ने इस
मंदिर का प्रासाद खाया तो उसको आजीवन बिधवा रहना पडेगा उसका पति मर जाएगा

बात है जौनपुर जनपद रामनगर ब्लाक मुख्यालय से पांच किलोमीटर की दूरी पर स्थित अहिरौली गांव जहां एक बड़े तालाब के किनारे लौहारदेव का मन्दिर है । वर्ष 2003 में इस मन्दिर को बनवाने के लिए नींव की खुदाई हो रही थी जहां सैकड़ों ग्रामीण मौजूद थे और उनकी प्रबल इच्छा हुई कि लौहारदेव दर्शन दें। लोगों के आश्चर्य का ठिकाना न रहा जब थोड़ी देर में सर्प रूप में चबूतरे पर आकर लौहार देव ने ग्रामीणों को दर्शन दिया। उनकी मूर्ति पहले नाग रूप में चबूतरे पर स्थापित थी जहां आज भी सैकड़ों वर्ष पुराना बरगद का विशाल पेड़ मौजूद है।

ऐसा मान्यता है कि लोहार देव उस मंदीर के आस पास रह रहे दुबे परिवार के कुल देवता है । कहाजाता है कि बहुत सम
पहले वहा एक दुबेपरिवार रहता था जिसके पुत्र थेजब इनकी माँ सबके लिए खाना लगती तो वहा अपने आप एक भोजन की थाली और लग जाती थीइससमस्या को हल करने के लिए बनारस से एक प्रकांड पंडित जी बुलवाए गए । आह्वान करने पर लौहारदेव प्रकट हुए और कहा कि मैं इनका सातवां पुत्र हूं।

एक किंवदन्ती के अनुसार इन सातों भाइयों की एक बहन थी। एक बार रक्षाबन्धन के दिन उसने कहा कि सभी भाई तो राखी बांधने पर कुछ उपहार जरूर देंगे लेकिन सातवां जो आधा मानव व आधा सर्प था वह क्या देगा। इस पर उन्होंने कहा कि बहन राखी बांधने के बाद तुम मेरी पूंछ का एक इंच भाग
काट लेना तो सोना हो जायेगा। लालच में आकर बहन ने पूंछ का कुछ ज्यादा भाग काट लिया। इस दौरान रक्तस्त्राव होने पर पीड़ा होने के कारण श्राप दिया यहां मेरा एक मंदिर तो भविष्य में बनेगा लेकिन उनके खानदान के विस्तार के बाद भी कोई पुत्री उनका प्रसाद नहीं खा सकेगी। यदि ऐसा हुआ तो उसे विधवा का जीवन व्यतीत करना पड़ेगा।

अब इस कहानी में कितनी सच्चाई है ये तो किसी को नही पता लेकिन वहा के लोग आज भी अपने पुत्रियों को मंदिर में जाने से मना करते है
















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साँस लेते हुए भी डरता हूँ! ये न समझें कि आह करता हूँ! बहर-ए-हस्ती में हूँ मिसाल-ए-हुबाब! मिट ही जाता हूँ जब उभरता हूँ! इतनी आज़ादी भी ग़नीमत है! साँस लेता हूँ बात करता हूँ! शेख़ साहब खुदा से डरते हो! मैं तो अंग्रेज़ों ही से डरता हूँ! आप क्या पूछते हैं मेरा मिज़ाज! शुक्र अल्लाह का है मरता हूँ! ये बड़ा ऐब मुझ में है 'yaro'! दिल में जो आए कह गुज़रता हूँ!
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